Home खण्डन मण्डन द्रौपदी के कितने पति थे ?

द्रौपदी के कितने पति थे ?

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💐 प्रकरण का उपसंहार एवं द्रौपदी के पञ्चभर्त्री होने का रहस्य 💐

उपर्युक्त प्रमाण देकर एवं आक्षेपकर्ता के दिये प्रमाणों की समीक्षा करके हमने यह सिद्ध किया कि द्रौपदी जी के पांच पति थे, जिनके विषय में अनावश्यक विवाद एवं भ्रम की स्थिति उत्पन्न की जा रही है। हमने यब भी सिद्ध किया कि द्रौपदी के पांच पतियों की बात मैक्समूलर की फैलाई हुई अफवाह नहीं है।

अब हम संक्षेप में आपको यह बताएंगे कि क्यों द्रौपदी जी का विवाह इस विचित्रता के साथ हुआ एवं इसमें कोई धार्मिक आपत्ति क्यों नहीं है। साथ ही, हम यह भी देखेंगे कि मानवों के समाज में यह बाकियों के लिए क्यों अव्यवहार्य है। पूर्व के प्रमाणों से यह सिद्ध हो चुका है कि धर्मराज युधिष्ठिर ने माता कुन्ती एवं शेष भाईयों के साथ परामर्श करके वेदव्यास जी के वाक्य का अनुसरण करते हुए सम्मिलित रूप से द्रौपदी के साथ विवाह करने का निश्चय किया। इसके बाद वे सभी राजा द्रुपद के महल में गए, जहां पर राजा ने युधिष्ठिर जी से निम्न बात कही –

भवान्वा विधिवत्पाणिं गृह्णातु दुहितुर्मम।
यस्य वा मन्यसे वीर तस्य कृष्णामुपादिश॥
हे वीर ! आप ही मेरी पुत्री का विधिवत् पाणिग्रहण करें। अथवा जिसे भी आप उचित समझें, उसके साथ मेरी पुत्री के विवाह का निर्देश करें।

युधिष्ठिर उवाच
सर्वेषां महिषी राजन्द्रौपदी नो भविष्यति।
एवं प्रव्याहृतं पूर्वं मम मात्रा विशांपते॥
(महाभारत, आदिपर्व, अध्याय – २१०, श्लोक – २२-२३)

युधिष्ठिर ने कहा – हे राजन् ! द्रौपदी हम सबों की पत्नी बनेगी, ऐसा मेरी माता के द्वारा पूर्व में ही निश्चित कर दिया गया है।

राजा द्रुपद को यह बात अव्यावहारिक लगी एवं वे संकोच में पड़ गए। उस समय वेदव्यास जी ने उन्हें द्रौपदी के एक अन्य पूर्वजन्म (नालायनी) का वृत्तान्त सुनाते हुए कहा कि द्रौपदी किसी अन्य जन्म में पति की कामना से तपस्या कर रही थी। यह कथा गीताप्रेस अथवा सातवलेकर संस्करण में यथावत् नहीं है, किन्तु इस घटना का संक्षिप्त संकेत गीताप्रेस के महाभारत, आदिपर्व, अध्याय – १९६ एवं सातवलेकर संस्करण के अध्याय १८९ के अंत में मिलता है। इससे पूर्व के नालायनी मौद्गल्य प्रसङ्ग के दो अध्याय सभी संस्करणों में प्राप्त नहीं होते हैं।

तीव्रेण तपसा तस्यास्तुष्टः पशुपतिः स्वयम्।
वचं प्रादात्तदा रुद्रः सर्वलोकेश्वरः प्रभुः॥
भविष्यति परं जन्म भविष्यति वराङ्गना।
भविष्यन्ति परं भद्रे पतयः पञ्च विश्रुताः॥
(महाभारत, आदिपर्व, अध्याय – २१३, श्लोक – १३-१४)

उसकी (नालायनी) की तीव्र तपस्या से संतुष्ट होकर पशुपति, सर्वलोकेश्वर भगवान् शिव ने उसे वचन दिया। हे वरांगने ! अन्य जन्म में तुम्हारे पांच पति प्रसिद्ध होंगे।

फिर उस स्त्री ने कहा –

स्त्र्युवाच
एकः खलु मया भर्ता वृतः पञ्च त्विमे कथम्।
एको भवति नैकस्या बहवस्तद्ब्रवीहि मे॥
महेश्वर उवाच
पञ्चकृत्वस्त्वया चोक्तः पतिं देहीत्यहं पुनः।
पञ्चते पतयो भद्रे भविष्यन्ति सुखावहाः॥
(महाभारत, आदिपर्व, अध्याय – २१३, श्लोक – १६-१७)

स्त्री ने कहा कि मैंने तो एक ही पति की कामना की थी, आप पांच कैसे दे रहे हैं ? एक स्त्री के तो बहुत से पति नहीं होने चाहिए। शिव जी ने कहा – तुमने मुझसे वरदान में पांच बार कहा – मुझे पति चाहिए। इसीलिए तुम्हारे सुखदाता पांच पति होंगे।

इस बात पर पुनः उस स्त्री ने कहा –
यदि मे पतयः पञ्च रतिमिच्छामि तैर्मिथः।
कौमारं च भवेत्सर्वैः संगमे संगमे च मे॥
यदि मेरे पांच पति होंगे, तो मैं उनमें से प्रत्येक के साथ संभोग करके पुनः कौमार्यावस्था को प्राप्त हो जाऊं। इस बात पर शिवजी ने पुनः वरदान दिया –

अन्यदेहान्तरे चैव रूपभाग्यगुणान्विता।
पञ्चभिः प्राप्य कौमारं महाभागा भविष्यसि॥
रूप, सौभाग्य एवं गुणों से युक्त अन्य देह में तुम पांच पतियों से सुख पाकर भी कौमार्यावस्था से युक्त महाभाग्यवती बनी रहोगी।

इसी क्रम में वेदव्यास जी पांच मन्वन्तरों के पांच इन्द्रों और उनकी राज्यश्री का प्रसङ्ग भी बताते हैं, उनका दिव्य दर्शन भी कराते हैं और कहते हैं कि कैसे वे पाँचों इन्द्र शिवश्राप से मनुष्य रूप में अवतरित हुए हैं और उनकी राज्यलक्ष्मी ही द्रौपदी बनकर आयी है इसीलिए पांचों के साथ विवाह में दोष नहीं लगेगा।

एवमेते पाण्डवाः संबभूवु-
र्ये ते राजन्पूर्वमिन्द्रा बभूवुः।
लक्ष्मीश्चैषां पूर्वमेवोपदिष्टा
भार्या यैषा द्रौपदी दिव्यरूपा॥

वेदव्यास जी आगे यह बात भी स्पष्ट करते हैं कि यह सभी लोग देवावतार हैं, अतएव इन्हें पूर्वनिर्धारित वरदान एवं श्राप के कारण दोष नहीं लगेगा, किन्तु स्मरण रहे कि ऐसा विवाह सामान्य मनुष्यों के लिए नहीं है।

नायं विधिर्मानुषाणां विवाहे
देवा ह्येते द्रौपदी चापि लक्ष्मीः।
प्राक्कर्मणः सुकृतात्पाण्डवानां
पञ्चानां भार्या देवदेवप्रसादात्॥
तेषामेवायं विहितः स्याद्विवाहो
यथा ह्येष द्रौपदीपाण्डवानाम्।
अन्येषां नृणां योषितां च
न धर्मः स्यान्मानवोक्तो नरेन्द्र॥

यह मनुष्यों के विवाह की विधि नहीं है। ये सभी (पाण्डव) देवता हैं, और द्रौपदी लक्ष्मी का अंश है। पांडवों के पूर्वकृत कर्म से ही, एवं देवाधिदेव महादेव की कृपा से ये इन पांचों की पत्नी होगी। यह विवाह इन लोगों के लिए ही बना है, द्रौपदी एवं पांडवों पर ही लागू होता है। अन्य मनुष्यों एवं उनकी स्त्रियों के लिए यह मार्ग धर्म का नहीं कहा गया है। (शेष जनों के लिए यह निषिद्ध है)

यह प्रसङ्ग कुछ प्रतियों में मिलता है, एवं कुछ में नहीं। मैं सभी प्रतियों के पाठभेदों के सम्मिलित रूप का प्रयोग कर रहा हूँ। उदाहरण के लिए ये स्त्री की तपस्या एवं उसे शिव जी का वरदान गीताप्रेस की प्रति में आदिपर्व, अध्याय – १९६ में है तो नीलकंठ चतुर्धर के संस्करण में यह आदिपर्व, अध्याय – १९७ में है। सातवलेकर संस्करण में यह प्रसङ्ग आदिपर्व, अध्याय – १८९ में ही है। हालांकि उन तीनों में मेरे द्वारा दिये गए श्लोक इसी क्रम से नहीं हैं। उपर्युक्त संस्करणों में इस प्रसङ्ग को पढ़ने के लिए बताए गए अध्यायों में …

आसीत्तपोवने काचिदृषेः कन्या महात्मनः।
नाध्यगच्छत्पतिं सा तु कन्या रूपवती सती॥

इस श्लोक से प्रारम्भ करके

सैषा देवी रुचिरा देवजुष्टा
पञ्चानामेका स्वकृतेनेह कर्मणा।
सृष्टा स्वयं देवपत्नी स्वयंभुवा
श्रुत्वा राजन्द्रुपदेष्टं कुरुष्व॥

इस श्लोक के साथ कुल ९ श्लोकों में अध्याय पूर्ति तक पढ़ें।

मैंने जो श्लोक दिए हैं वे संस्कृत विकिस्रोत परियोजना के अंतर्गत सभी उपलब्ध प्रतियों के सभी पाठभेदों के प्रसंगानुसार सम्मिलित सर्वाधिक बृहत्तर संस्करण से लिये गए हैं, जिसमें सभी प्रतियों के पाठ को एक साथ रखा गया है। उसमें जो गीताप्रेस एवं सातवलेकर आदि संस्करण के श्लोक हैं, वह आदिपर्व, अध्याय – २१४ में प्राप्त होंगे। बृहत्तर संस्करण में द्रौपदी के एक और जन्म, नालायनी एवं उसका मौद्गल्य के साथ रतिक्रिया को लेकर हुए विवाद एवं फलस्वरूप पञ्चभर्त्री होने के श्राप का गुप्त वर्णन है, उसी के श्लोक हमने ऊपर दिए हैं। शेष सभी प्रसङ्गों के श्लोक में भी अलग अलग संस्करणों के अनुसार अध्याय भेद अथवा किंचित्मात्र पाठभेदों की अतुल्यता हो सकती है, पाठक जन विवेक से अध्ययन करेंगे। अध्याय की संख्या में भेद हो सकता है किंतु तदनुसार प्रसङ्गों में श्लोक यथावत् ही मिलेंगे। शिवपुराण में स्पष्ट वर्णन है कि पुराणों के कई संस्करण होते हैं जिन्हें अधिकृत वेदव्यास कई बार पाठभेद के साथ बदलते हैं। इतिहास ग्रंथों का अधिकार भी वेदव्यास जी के पास ही होता है जो अलग अलग लोकों के लिए निर्धारित की जाती है इसीलिए ऐसे अध्याय एवं पाठभेदों का होना अमान्य नहीं है अपितु स्वीकृत एवं अनुकरणीय ही है।

महाभारत भी, रामायण की ही भांति मूलतः सौ करोड़ श्लोकों में लिखी गयी थी, जिसमें लक्षाधिक संस्करण पृथ्वीवासियों के लिए विहित किया गया। इसमें जो जो भाग वेदव्यास जी के उपदेश के अनुसार गणेश जी ने लिखा, एवं उन्हीं की कही बातों के आधार पर अन्य ऋषियों ने अपनी प्रतिलिपियाँ बनायीं, उसमें पाठभेद और अध्यायभेद होना मान्य ही है। बस, आजकल जो नए नए सम्प्रदाय, समाज, और परिवार वाले अपनी बातों को बलपूर्वक सत्य सिद्ध करने के लिए भ्रामक और प्रक्षिप्तांश वाली प्रतियां छाप रहे हैं, उनसे सावधान रहें। किंतु सार यह है कि मैक्समूलर के जन्म से डेढ़ सौ वर्ष पहले आचार्य नीलकंठ चतुर्धर ने सम्पूर्ण महाभारत पर भाष्य लिखा था। इस भाष्य के लिए उन्होंने स्वयं भी देशभर की सैकड़ों प्रतियों एवं उनपर पूर्वाचार्य गुरुओं की सम्मति या टिप्पणियों के आश्रय लेकर स्वयं लेखन किया था। जैसा कि आचार्य नीलकंठ कहते हैं –

बहून् समाहृत्य विभिन्नदेश्यान् कोशान् विनिश्चित्य च पाठमग्र्यम्।
प्राचां गुरूणामनुसृत्य वाचमारभ्यते भारतभावदीपः॥

भारत भावदीप नामक इस महाभारतीय टीका की रचना मैक्समूलर के जन्म से डेढ़ सौ वर्ष पूर्व ही हो गयी थी। इस टीका और उसके मूल पाठ में भी द्रौपदी के पांच पतियों का वर्णन बहुतायत से आया है, इसी टीका के पाठ को प्रधान आश्रय मानते ही गीताप्रेस ने महाभारत का प्रकाशन किया था। इसके अतिरिक्त मैक्समूलर से आठ सौ वर्ष पूर्व के श्रीमध्वाचार्य जी के महाभारततात्पर्यनिर्णय में भी यह बात स्पष्ट की गई है। इस प्रकार द्रौपदी के पांच पति होने की बात न २०० वर्ष से प्रचारित भ्रम है, और न ही यह प्रसङ्ग प्रक्षिप्त है। अपितु यह सर्वथा सत्य है, सर्वमान्य है और निर्विवाद है।

श्रीमन्महामहिम विद्यामार्तण्ड श्रीभागवतानंद गुरु
His Holiness Shri Bhagavatananda Guru