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द्रौपदी के कितने पति थे ?

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💐 कुतर्की का प्रमाण ०६ 💐

पाण्डव वनवास में थे, दुर्योधन की बहन का पति सिंधुराज जयद्रथ उस वन में आ गया। उसने द्रौपदी को देखकर पूछा -तुम कुशल तो हो? द्रौपदी बोली सकुशल हूं।मेरे पति कुरु कुल-रत्न कुन्तीकुमार राजा युधिष्ठिर भी सकुशल हैं। मैं और उनके चारों भाई तथा अन्य जिन लोगों के विषय में आप पूछना चाह रहे हैं, वे सब भी कुशल से हैं। राजकुमार ! यह पग धोने का जल है। इसे ग्रहण करो।यह आसन है, यहाँ विराजिए।-

कौरव्यः कुशली राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः
अहं च भ्राताश्चास्य यांश्चा न्यान् परिपृच्छसि ।-(१२-२६७-१६९४)

द्रौपदी भीम,अर्जुन,नकुल,सहदेव को अपना पति नहीं बताती,उन्हें पति का भाई बताती है।

और आगे चलकर तो यह एकदम स्पष्ट ही कर देती है। जब युधिष्ठिर की तरफ इशारा करके वह जयद्रथ को बताती है—

एतं कुरुश्रेष्ठतमम् वदन्ति युधिष्ठिरं धर्मसुतं पतिं मे ।-(२७०-७-१७०१)

“कुरू कुल के इन श्रेष्ठतम पुरुष को ही ,धर्मनन्दन युधिष्ठिर कहते हैं। ये मेरे पति हैं।”

क्या अब भी सन्देह की गुंजाइश है कि द्रौपदी का पति कौन था ?

💐 कुतर्की के छठे प्रमाण का समाधान 💐

इस पूरे प्रसङ्ग में भी जानबूझकर कर आक्षेपकर्ता ने वे सारे प्रमाण छोड़ दिये हैं, जिनसे द्रौपदी पांचों पांडवों की पत्नी सिद्ध हो सकती थी। जब कोटिकास्य को जयद्रथ ने द्रौपदी का परिचय लेने भेजा था, तो द्रौपदी ने कहा –

अपत्यमस्मि द्रुपदस्य राज्ञः
कृष्णेति मां शैब्य विदुर्मनुष्याः।
साऽहं वृणे पञ्चजनान्पतित्वे
ये खाण्डवप्रस्थगताः श्रुतास्ते॥
(महाभारत, वनपर्व, अध्याय – २६७, श्लोक – ०५)

मैं राजा द्रुपद की बेटी हूँ, मुझे लोग कृष्णा के नाम से जानते हैं। मैं वही हूँ, जिसने खाण्डवप्रस्थ के अधिपति के रूप में प्रसिद्ध पांच जनों (पांडवों) का पतिरूप में वरण किया है।

यही बात कोटिकास्य ने भी जाकर जयद्रथ को बताई –

एषा वै द्रौपदी कृष्णा राजपुत्री यशस्विनी।
पञ्चानां पाण्डुपुत्राणां महिषी संमता भृशम्॥
(महाभारत, वनपर्व, अध्याय – २६८, श्लोक – ०६)

यह यशस्विनी स्त्री, राजकुमारी कृष्णा, द्रौपदी है। ये पांचों पांडवों की स्वीकृति से अपनायी हुई, रानी है।

पुनः जयद्रथ भी जाकर द्रौपदी से उनके ‘पतियों’ की चर्चा करता है –

कुशलं ते वरारोहे भर्तारस्तेऽप्यनामयाः।
येषां कुशलकामासि तेऽपिकच्चिदनामयाः॥
(महाभारत, वनपर्व, अध्याय – २६८, श्लोक – १०)

हे सुंदर कटिप्रदेश वाली ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे पति भी स्वस्थ होंगे। तुम तो जिनके कुशल की कामना करती हो, वे लोग भी रोग आदि से मुक्त ही रहते हैं। (ध्यान दें, श्लोक में भर्तारः शब्द है, बहुवचन है, बहुत से पतियों की बात है)

अब आते हैं इस प्रसङ्ग के सर्वाधिक पुष्ट प्रमाणों की ओर … आक्षेपकर्ता ने युधिष्ठिर को पति बताने वाला श्लोक तो प्रमाण में दिया किन्तु उसके ठीक बाद के जिन श्लोकों में द्रौपदी ने शेष पांडवों का परिचय देते हुए उनको अपना पति बताया है, उन्हें जानबूझकर, समाज को भ्रमित करने के उद्देश्य से छोड़ दिया। हम आपको वे सभी श्लोक बताते हैं।

य एष जाम्बूनदशुद्धगौर:,
प्रचण्डघोणस्तनुरायताक्षः।
एतं कुरुश्रेष्ठतमं वदन्ति
युधिष्ठिरं धर्मसुतं पतिं मे॥
(महाभारत, वनपर्व, अध्याय २७१, श्लोक – ०७)

जो गोरे रंग के हैं,स्वर्ण के समान तेजस्वी हैं, विशाल नासिका, शरीर और नेत्रों वाले हैं, इन्हें कुरुवंश में श्रेष्ठ कहा जाता है, ये धर्मपुत्र युधिष्ठिर मेरे पति हैं।

अथाप्येनं पश्यसि यं रथस्थं
महाभुजं सालमिव प्रवृद्धम्।
संदष्टौष्ठं भ्रुकुटीसंहतभ्रुवं
वृकोदरो नाम पतिर्ममैषः॥
(महाभारत, वनपर्व, अध्याय २७१, श्लोक – ०९)

और अब तुम जिन्हें रथ में बैठा हुआ देख रहे हो, जो विशाल भुजाओं वाले हैं, साल के वृक्ष के समान विस्तृत हैं, जो क्रोध से अपने होठ चबा रहे हैं एवं जिनकी भृकुटि टेढ़ी हो गयी है, वो वृकोदर (भीम का दूसरा नाम) मेरे पति हैं।

धनुर्धराग्र्यो धृतिमान्यशस्वी
जितेन्द्रियो वृद्धसेवी नृवीरः।
भ्राता च शिष्यश्च युधिष्ठिरस्य
धनंजयो नाम पतिर्ममैषः॥
(महाभारत, वनपर्व, अध्याय २७१, श्लोक – १२)

जो धनुर्धरों में अग्रणी हैं, सहनशील हैं, यशस्वी हैं, अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण रखने वाले हैं, वृद्धों की सेवा करने वाले हैं, मनुष्यों के श्रेष्ठ वीर हैं, जो युधिष्ठिर के भाई (एवं अनुगामी शिष्य) हैं, वे धनञ्जय (अर्जुन का दूसरा नाम) मेरे पति हैं।

यस्योत्तमं रूपमाहुः पृथिव्यां
यं पाण्डवाः परिरक्षन्ति सर्वे।
प्राणैर्गरीयांसमनुव्रतं वै
स एष वीरो नकुलः पतिर्मे॥
(महाभारत, वनपर्व, अध्याय २७१, श्लोक – १५)

जो इस पृथ्वी पर अत्यंत उत्तम रूप वाले हैं, सभी पांडव अपने प्राणों से बढ़कर जिनकी रक्षा करते हैं, जो अपने भाईयों के अनुरूप आचरण करते हैं, ऐसे वीर नकुल मेरे पति हैं।

बुद्ध्या समो यस्य नरो न विद्यते
वक्ता तथा सत्सु विनिश्चयज्ञः।
स एष शूरो नित्यममर्षणश्च
धीमान्प्राज्ञः सहदेवः पतिर्मे॥
(महाभारत, वनपर्व, अध्याय २७१, श्लोक – १८)

जिनके समान बुद्धि किसी मनुष्य में नहीं है, जो श्रेष्ठ जनों के मध्य उत्तम निर्णय करते हैं, अच्छे वक्ता हैं, ये ओजस्विता से भरे हुए वीर, एवं बुद्धिमान् ज्ञानी सहदेव मेरे पति हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि कैसे धूर्त समाजियों ने अपनी बात को बलपूर्वक मनवाने के लिए युधिष्ठिर को पति बताने वाला श्लोक तो लिखा किन्तु उसके ठीक बाद जिन श्लोकों में द्रौपदी ने क्रमशः अपने बाकी पतियों का विवरण दिया है, उन श्लोकों को जानबूझकर कर नहीं लिखा है। स्वयं इस प्रकार का भ्रम फैलाने वाले ये लोग समाज को भ्रममुक्त करने का दावा करते हैं। स्वयं महाप्रस्थान के समय द्रौपदी की मृत्यु होने पर युधिष्ठिर ने भीम को उत्तर दिया था –

पक्षपातो महानस्या विशेषेण धनंजये।
तस्यैतत्फलमद्यैषा भुङ्क्ते पुरुषसत्तम॥
(महाभारत, महाप्रस्थानिक पर्व, अध्याय – ०२, श्लोक – ०६)

हे पुरुषश्रेष्ठ ! इस द्रौपदी का अर्जुन के प्रति विशेष आकर्षण था, (जबकि यह सबों की पत्नी थी) इसी पक्षपात के कारण उत्पन्न फल को यह भोग रही है (मार्ग में ही मृत्यु को प्राप्त हो गयी)

पांचों पांडवों से द्रौपदी को एक एक सन्तान की प्राप्ति भी हुई थी, जिनका विवरण भी मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ। वनवास के मध्य महारानी सत्यभामा द्रौपदी सम्वाद है। – ध्यान देंगे कि कुचक्री समाजी जन तो श्रीकृष्ण भगवान् की एक ही पत्नी रुक्मिणी का उल्लेख करते हैं, जबकि महाभारत में ही द्रौपदी और सत्यभामा का विस्तृत सम्वाद वर्णित है। ये लोग तो भगवान् श्रीकृष्ण को ईश्वर अथवा वैष्णव अवतार मानते ही नहीं हैं, और जिन प्रसङ्गों से इनके मत का खण्डन होता है, उन्हें ये लोग धूर्तता करते हुए मिलावटी घोषित कर देते हैं। अस्तु, सत्यभामा जी ने द्रौपदी से कहा है –

पुत्रस्ते प्रतिविन्ध्यश्च सुतसोमस्तथाविधः।
श्रुतकर्माऽर्जुनिश्चैव शतानीकश्च नाकुलिः॥
सहदेवाच्च यो जातः श्रुतसेनस्तवात्मजः।
सर्वे कुशलिनो वीराः कृतास्त्राश्च सुतास्तव॥
अभिमन्युरिव प्रीता द्वारवत्यां रता भृशम्।
त्वमिवैषां सुभद्रा च प्रीत्या सर्वात्मना स्थिता॥
(महाभारत, वनपर्व, अध्याय – २३६, श्लोक – १०-१२)
तुम्हारा प्रतिविन्ध्य नाम का पुत्र, एवं उसी प्रकार सुतसोम, अर्जुन का पुत्र श्रुतकर्मा एवं नकुल का पुत्र शतानीक, तथा सहदेव से तुम्हारा जो पुत्र उत्पन्न हुआ है, श्रुतसेन, ये सभी वीर कुशल हैं, सभी जन अस्त्रों से युक्त हैं। जैसे द्वारिका में अभिमन्यु सुखपूर्वक रह रहा है, वैसे ही ये सभी रह रहे हैं। तुम जैसे इनका पालन करती थी, सुभद्रा भी वैसा ही करती है।

अब मैं बताता हूँ कि द्रौपदी को उपर्युक्त पांचों पुत्र किस प्रकार और गुणों से युक्त होकर पांचों पांडवों से प्राप्त हुए थे –

पाञ्चाल्यपि तु पञ्चभ्यः पतिभ्यः शुभलक्षणा।
लेभे पञ्च सुतान्वीराञ्श्रेष्ठान्पञ्चाचलानिव॥
युधिष्ठिरात्प्रतिविन्ध्यं सुतसोमं वृकोदरात्।
अर्जुनाच्छ्रुतकर्माणं शतानीकं च नाकुलिम्॥
सहदेवाच्छ्रुतसेनमेतान्पञ्च महारथान्।
पाञ्चाली सुषुवे वीरानादित्यानदितिर्यथा॥

शुभ लक्षणों वाली पाञ्चाली (द्रौपदी) ने भी पांच पतियों से पांच श्रेष्ठ पर्वतों के समान पांच वीर पुत्र प्राप्त किये। युधिष्ठिर से प्रतिविन्ध्य, वृकोदर (भीम) से सुतसोम, अर्जुन से श्रुतकर्मा और नकुल से शतानीक को प्राप्त किया। सहदेव से श्रुतसेन, इन पांचों महारथियों को पांचाली से वैसे ही जन्म दिया, जैसे अदिति ने आदित्यों को जन्म दिया था।

शास्त्रतः प्रतिविन्ध्यन्तमूचुर्विप्रा युधिष्ठिरम्।
परप्रहरणज्ञाने प्रतिविन्ध्यो भत्वयम्॥
सुते सोमसहस्रे तु सोमार्कसमतेजसम्।
सुतसोमं महेष्वासं सुषुवे भीमसेनतः॥
श्रुतं कर्म महत्कृत्वा निवृत्तेन किरीटिना।
जातः पुत्रस्तथेत्येवं श्रुतकर्मा ततोऽभवत्॥

शास्त्र की बात को जानने वाले ब्राह्मणों ने युधिष्ठिर से कहा, दूसरे (शत्रु) के (बल, कीर्ति, प्राण) हरण में दक्ष होने से इस बालक का नाम प्रतिविन्ध्य होगा। भीमसेन से जिस पुत्र की प्राप्ति हुई है वह हज़ारों चंद्रमा के समान, और हज़ारों सूर्यों के समान तेजस्वी है। (भविष्य में) विशाल धनुष को धारण करने वाले इस बालक का नाम सुतसोम होगा। मुकुट धारण करने वाले अर्जुन ने महान् कर्म को करने के बाद इस पुत्र को जन्म दिया है, इसीलिए यह पुत्र “श्रुतकर्मा”, इस नाम वाला हुआ।

शतानीकस्य राजर्षेः कौरव्यस्य महात्मनः।
चक्रे पुत्रं सनामानं नकुलः कीर्तिवर्धनम्॥
ततस्त्वजीजनत्कृष्णा नक्षत्रे वह्निदैवते।
सहदेवात्सुतं तस्माच्छ्रुतसेनेति तं विदुः॥
एकवर्षान्तरास्त्वेते द्रौपदेया यशस्विनः।
अन्वजायन्त राजेन्द्र परस्परहितैषिणः॥
(महाभारत, आदिपर्व, अध्याय – २४७, श्लोक – ७४-८२)

कुरुवंश में जो शतानीक नाम वाले महात्मा राजर्षि हो चुके हैं, उन्हीं के समान कीर्ति को बढ़ाने वाले इस नकुल पुत्र का नाम शतानीक होगा। अग्नि सम्बन्धी नक्षत्र में कृष्णा (द्रौपदी) ने सहदेव से जिस पुत्र को जन्म दिया है, उसे श्रुतसेन के नाम से जानो। इस प्रकार, एक-एक वर्ष के अंतराल से आपस में हितकारिणी भावना वाले उन द्रौपदीपुत्रों ने जन्म लिया।

इतने प्रमाणों के बाद भी किसी को संदेह होगा, कि द्रौपदी केवल युधिष्ठिर की ही पत्नी थी ? ऐसा नहीं है। अपितु, वह सभी पांडवों की पत्नी थी।

💐 कुतर्की का प्रमाण ०७ 💐
कृष्ण संधि कराने गए थे। दुर्योधन को धिक्कारते हुए कहने लगे”– दुर्योधन! तेरे सिवाय और ऐसा अधम कौन है जो बड़े भाई की पत्नी को सभा में लाकर उसके साथ वैसा अनुचित बर्ताव करे जैसा तूने किया। –

कश्चान्यो भ्रातृभार्यां वै विप्रकर्तुं तथार्हति।
आनीय च सभां व्यक्तं यथोक्ता द्रौपदीम् त्वया ॥(२८-८-२३८२)

कृष्ण भी द्रौपदी को दुर्योधन के बड़े भाई की पत्नी मानते हैं।

अब सत्य को ग्रहण करें और द्रौपदी के पवित्र चरित्र का सम्मान करें।

💐 कुतर्की के सातवें प्रमाण का समाधान 💐

उपर्युक्त श्लोक के सन्दर्भ में जो संख्या (२८-८-२३८२) दी गयी है, उसका भाव स्पष्ट नहीं है, किन्तु फिर भी मैं बताता हूँ कि यह श्लोक महाभारत के उद्योगपर्व, अध्याय १२८ (पाठभेद से अध्याय संख्या में भिन्नता हो सकती है), श्लोक आठ के रूप में वर्णित है।

किन्तु कुतर्की ने यहां अर्थ का घोर अनर्थ किया है। श्लोक में भी द्रौपदी के स्थान पर द्रौपदीम् लिख कर अशुद्धि की है। भगवान् श्रीकृष्ण के वचन वाले इस श्लोक में केवल “भ्रातृभार्यां” शब्द है। इसका अर्थ है, ‘भाई की पत्नी’। भातृभार्या शब्द से कहीं भी यह बोध नहीं होता कि बड़े भाई की पत्नी या छोटे भाई की पत्नी … किन्तु कुतर्की बलपूर्वक आज सिद्ध करना चाहता है कि द्रौपदी केवल युधिष्ठिर की पत्नी है, इसीलिए दुर्बुद्धि से युक्त होकर भातृभार्या का अर्थ “बड़े भाई” की पत्नी किया, जबकि इसके अर्थ में बड़े या छोटे का कोई भाव ही नहीं है। वैसे भी युधिष्ठिर की पत्नी होने से द्रौपदी दुर्योधन की (बड़े भाई की पत्नी) मातृतुल्या होती और साथ ही अर्जुनादि (छोटे भाईयों) की पत्नी होने से दुर्योधन के लिए पुत्रीतुल्या होतीं। दोनों स्थितिभेद से दुर्योधन का द्रौपदी के साथ माता या पुत्री सा व्यवहार होता, जो दुर्योधन में नहीं किया। इसीलिए भातृभार्या शब्द का अर्थ, “बड़े” भाई की पत्नी न होकर, मात्र भाई की पत्नी ही है।

मुझे इसका आश्चर्य नहीं होता कि इसके ठीक बाद वाले श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण ने जो बात कही है, उसे आक्षेपकर्ता ने क्यों नहीं उल्लिखित किया। अगले ही श्लोक में श्रीकृष्ण के वचनों से द्रौपदी का सभी पांडवों की पत्नी होना सिद्ध होता है।

कुलीना शीलसंपन्ना प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ।
महिषी पाण्डुपुत्राणां तथा विनिकृता त्वया॥
(महाभारत, उद्योगपर्व, अध्याय – १२८, श्लोक – ०९)

ये उत्तम कुल में उत्पन्न, शील से युक्त (द्रौपदी), जो ‘पाण्डु के पुत्रों’ की प्राणों से भी अधिक प्रिय पटरानी है, तुम्हारे द्वारा अपमानित की गई।

यहां भगवान् ने द्रौपदी के पति के लिए बहुवचन ‘पाण्डुपुत्राणां’ शब्द का प्रयोग करके यह स्वीकार किया है कि द्रौपदी सभी पांडवों की पत्नी थी। द्रौपदी जी के चरित्र का सम्मान सभी सनातनी करते हैं। उनपर कोई पुराणेतिहासज्ञ व्यक्ति आक्षेप नहीं करता। हां, वामपंथी और नास्तिक धर्मद्रोही व्यक्ति अवश्य उनपर आक्षेप करते हैं, जिनको उत्तर देने का पाखण्ड करते हुए आर्य समाज जैसी प्रायोजित संस्थाओं के लोग बड़ी धूर्तता से हमारे सनातनी ग्रंथों को ही प्रक्षिप्त कहने लगते हैं। वस्तुतः द्रौपदी के पांच पति थे, और ऐसा क्यों था, इसका मैं पूरा विस्तृत विवेचन प्रस्तुत कर चुका हूँ।

अब सत्य को ग्रहण करें और द्रौपदी के पवित्र चरित्र का सम्मान करें, उनमें न कोई दोष है, न ग्रंथ में कोई मिलावट। मिलावट केवल इन धूर्तों के मस्तिष्क में है, जो स्वयं ही अपने लेखों में श्लोक लिखते समय उसी प्रसङ्ग के अगले पिछले अध्याय अथवा श्लोकों की उपेक्षा करके केवल मनमानी बातों को कहते जाते हैं, और जब पूरे प्रसङ्ग का सर्वांगीण सत्य हम जैसे लोग समाज के सामने रखते हैं, तो उल्टा हमें ही, ब्राह्मणों एवं पुरोहितों को ही अंग्रेजों का दलाल, मिलावटकर्ता अथवा धर्मद्रोही कहकर अपमानित कर दिया जाता है।