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वेदों के सगुण स्वरूप का रहस्य

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प्रश्नकर्ता श्री अरुण उपाध्याय जी – एक प्रश्न कई लोगों से पूछा। इसका उत्तर नहीं मिला। इस पर विचार कीजिएगा। इन वेदस्तुति का स्रोत क्या है तथा उनका मुख विभिन्न पशुओं जैसा क्यों है-

ऋग्वेदः श्वेतवर्णश्च द्विभुजो रासभाननः।
अक्षमालाम्बुपात्रं च बिभ्रन् स्वाध्ययने रतः॥
अजाऽऽस्य पीतवर्णश्च यजुर्वेदोऽक्षसूत्रवान्।
वामे चाङ्कुशपाणिस्तु भूतिदो मङ्गलावहः॥
नीलोत्पलदलाभासः सामवेदो हयाननः।
अक्षमालाधरः सव्ये वामे कम्बुधरः स वै॥
अथर्वणाभिधो वेदो धवलो मर्कटाननः।
अक्षसूत्रं च खट्वाङ्गं बिभ्रन् वै विजयप्रदः॥

निग्रहाचार्य श्रीभागवतानंद गुरु – देवता कामरूप होते हैं। कर्मेच्छानुसार अपने स्वरूप को परिवर्तित करते हैं –

शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गतः।
(श्रीमद्भागवत एवं सात्त्वत संहिता)

शुक्लो रक्तस्तथा पीतो वर्णोऽस्यानुयुगं धृतः।
द्वापरान्ते कलेरादौ बालोऽयं कृष्णतां गतः॥
(गर्ग संहिता, गिरिराजखण्ड)

वेदनारायण के भी विभिन्न स्वरूप वर्णित हैं। चरणव्यूहकार कहते हैं –

अथातः ऋग्वेदः पीतवर्णः पद्मपत्राक्षः सुविभक्तग्रीवः कुञ्चित केशश्मश्रुः सुप्रतिष्ठितजानुसङ्घः॥ अथ यजुर्वेदः प्रांशुः प्रलम्बजठरः स्थूलगलकपालो रक्तो वर्णेन प्रादेशाः षड्दीर्घत्वेन यजुर्वेदस्यैतद्रूपं भवति॥ अथ सामवेदः सुवर्चाः सुगन्धिस्तेजस्वी मृदुवक्ता ब्रह्मण्यः प्रलम्बबाहुर्दुश्चर्मी कृष्णो वर्णेन कातरः स्वरेणेति॥ अथातो ब्रह्मवेदः कपिलो वर्णेन तीक्ष्णः प्रचण्डः कामरूपी विश्वात्मा जितेन्द्रियः॥
(चरणव्यूह)

इसमें ऋग्वेद देवप्रधान, यजुर्वेद मनुष्यप्रधान एवं सामवेद पितृप्रधान है। (अथर्ववेद में तीनों का समाहरण है) जैसा महाराज मनु कहते हैं –

ऋग्वेदो देवदैवत्यो यजुर्वेदस्तु मानुषः।
सामवेदः स्मृतः पित्र्यस्तस्मात्तस्याशुचिर्ध्वनिः॥
(मनुस्मृति, चतुर्थ अध्याय)

इसमें सामवेद को अशुद्ध नहीं जानना चाहिए, अपितु उसकी ध्वनि पैत्र्यापवित्रदोष से ग्रस्त है, ऐसा समझना चाहिए, और मात्र उसके पाठ के समय शेष वेदमन्त्रों के अध्ययन का निषेध है, जैसा कि मन्वर्थमुक्तावलीकार ने स्पष्ट किया है –

ऋग्वेदो देव एव देवतास्येति देवदैवत्यः। यजुर्वेदो मानुषो मानुषदेवताकत्वात्। प्रायेण मानुषकर्मोपदेशाद्वा मानुषः। सामवेदः पितृदेवताकत्वात्पित्र्यः। पितृकर्म कृत्वा जलोपस्पर्शनं स्मरन्ति तस्मात्तस्याशुचिरिव ध्वनिः न त्वशुचिरेव। अतस्तस्मिञ्छ्रूयमाणे ऋग्यजुषी नाधीयीत॥
(मन्वर्थमुक्तावली)

वस्तुतः अनिरुद्ध संहिता के दूसरे अध्याय में “वेदानां सामवेदस्तु”, कूर्मपुराण के उत्तरभाग में “वेदानां सामवेदोऽहम्”, मत्स्यपुराण में “सामवेदस्तु वेदानाम्” आदि कहते हुए सामवेद को तो सभी वेदों में वरिष्ठ बताया गया है।

वेदों के ब्रह्ममुख से निःसरण के सन्दर्भ में निम्न वाक्य द्रष्टव्य हैं –

तस्मादण्डाद्विनिर्भिन्नाद्ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः।
ऋचो बभूवुः प्रथमं प्रथमाद्वदनान्मुने॥
जवापुष्पनिभाः सद्यस्तेजोरूपा ह्यसंवृताः।
पृथक्पृथग्विभिन्नाश्च रजोरूपा महात्मनः॥
यजूंषि दक्षिणाद्वक्त्रादनिबद्धानि कानिचित्।
यादृक्वर्णं तथा वर्णान्यसंहतिचराणि वै॥
पश्चिमं यद्विभोर्वक्त्रं ब्रह्मणः परमेष्ठिनः।
आविर्भूतानि सामानि ततः कुन्दसितान्यथा॥
अथर्वाणमशेषेण भृङ्गाञ्जनचयप्रभम्।
घोराघोरस्वरूपं तदाभिचारिकशान्तिमत्॥
उत्तरात्प्रकटीभूतं वदनात्तत्तु वेधसः।
मुखं सत्त्वतमःप्रायं सौम्यासौम्यस्वरूपवत्॥
ऋचो रजोगुणाः सत्त्वं यजुषाञ्च गुणो मुने।
तमोगुणानि सामानि तमःसत्त्वमथर्वसु॥
(मार्कण्डेय पुराण, अध्याय – ९९)

उपर्युक्त प्रमाण से स्पष्ट है कि प्रथम (पूर्व) मुख से जवापुष्प के (रक्ताभ) सदृश ऋग्वेद, दक्षिण से बालू के (धूम्रकपिलाभ) सदृश यजुर्वेद, पश्चिम से कुन्दपुष्प के (श्वेताभ) सदृश सामवेद एवं उत्तर से भौंरे एवं काजल के (कृष्णाभ) सदृश अथर्ववेद निःसृत हुए। किन्तु इनकी ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठा तत्तद्मुखों की ओर न होकर क्रमशः ब्रह्माजी के दक्षिण, पश्चिम, उत्तर एवं आगे (पूर्व) की ओर है।

ऋग्वेदो दक्षिणेनास्य यजुर्वेदश्च पश्चिमे।
उत्तरे सामवेदस्तु अग्रतोथर्वणस्तथा॥
(स्कन्दपुराण, अम्बिकाखण्ड, अध्याय – ५३)

अर्थात् जो वेद जिस मुख से निकले, वह अपने से दाहिने हाथ की ओर वाली दिशा में प्रतिष्ठित हुए। इनके नामकरण कैसे हुए ?

ऋच्यन्ते स्तूयन्ते देवा अनयेति ऋक्। जिसके द्वारा देवताओं की स्तुति की जाये, उसे ऋग्वेद कहते हैं। इसका मुख रासभ के समान है। रासते शब्दायत इति रासभः। जो शब्द उत्पन्न करे, वह रासभ कहलाता है। स्तुति ध्वन्यात्मक विषय है। ध्वनि शब्द तन्मात्रा का गुण है। इसका क्या लक्षण है ? कथं लक्षणिका ऋचः? । शबरस्वामी ‘तेषामृग्यत्रार्थवशेन पादव्यवस्था’ सूत्र के भाष्य में अनुग्रह करते हैं – यत्र पादकृता व्यवस्था स मन्त्र ऋग्नामा। जहाँ अर्थपरक पादव्यवस्था दिखे, उसका नाम ऋक् है। स्तुतिपाठ हेतु अर्थविन्यास आवश्यक है।

त इज्यन्तेऽनेनेति यजुष्। वे देवता जिस मन्त्र के द्वारा पूजित होते हैं, उसे यजुर्वेद कहते हैं। यह अज के समान मुख वाला है। यो न जायते नोत्पद्यते सोऽजः। जो जन्मोत्पत्ति से अतीत हो, वह अज है। वस्तुतः चार चरणों वाले एक ही वेद को चार भागों में वेदव्यास जी ने बांटा था।

वेदमेकं चतुष्पादं चतुर्धा व्यभजत्प्रभुः॥
(वायुपुराण, पूर्वार्द्ध, अध्याय – ६०)

अब ऐसा करने वाले वेदव्यास कौन थे ? पराशर जी बताते हैं कि उनके पुत्र (कृष्णद्वैपायन) ने ऐसा किया।

ततोऽत्र मत्सुतो व्यासो ह्यष्टाविंशतिमेऽन्तरे।
वेदमेकं चतुष्पादं चतुर्धा व्यभजत्प्रभुः॥
(विष्णुपुराण, तृतीय अंश, अध्याय – ०४, श्लोक – ०२)

जिस चार चरणों वाले एक ही वेद को चार अलग अलग भागों में बांटा गया, वह वेद मूलतः क्या है ? उत्तर मिला – यजुर्वेद।

एकश्चासीद्यजुर्वेदस्तं चतुर्धा व्यकल्पयत्।
(अग्निपुराण, अध्याय – १५०)

एकमेव यजुर्वेदं चतुर्धा व्यभजत्पुनः॥
(विष्णुधर्मोत्तरपुराण, प्रथम खण्ड, अध्याय – ७४)

अतएव जब महर्षि याज्ञवल्क्य ने अपने गुरु वैशम्पायन जी के द्वारा वेदबाह्य कर दिये जाने पर अदृष्ट वेदमन्त्रों के ज्ञान हेतु भगवान् सूर्य की निम्न श्लोक से स्तुति की –

नमः सवित्रे द्वाराय मुक्तेरमिततेजसे।
ऋग्यजुःसामरूपाय त्रयीधामात्मने नमः॥

तब भगवान् सूर्य ने उन्हें जो संहिता प्रदान की, उसका सम्बन्ध यजुर्वेद से ही था। अतः शेष वेदों को तो यजुषाश्रित कहा जा सकता है किन्तु यजुर्वेद पूर्णतः अजसंज्ञक ही है। इसका क्या लक्षण है ? अथ यजुषः किं लक्षणमिति ? शबरस्वामी कहते हैं – यजुषो लक्षणं न वक्तव्यम्। यजुर्वेद का लक्षण अलग से नहीं बताया जाता अपितु सामवेद और ऋग्वेद के लक्षण न दिखें तो यजुर्वेद जानो। ऋग्लक्षणसामलक्षणाभ्यामेव यजुर्विज्ञास्यते वैपरीत्येनया न गीतिर्न च पादबद्धं, तत्प्रश्लिष्टपठितं यजुरिति। ऋग्वेद के समान अर्थविन्यासपरक पादव्यवस्था न दिखे तथा सामवेद के समान गीतिबन्धन न हो, अपितु श्लिष्टपरक हो तो यजुर्वेद हैं, ऐसा समझना चाहिए। सरस्वतीकण्ठाभरणकार स्पष्ट करते हैं कि एक ही वाक्य में एकरूपीय शब्दों का अनेकार्थत्व श्लिष्ट है – श्लिष्टमिष्टमविस्पष्टमेकरूपान्वितं वचः।

स्यति छिनत्ति दुःखं गेयत्वादिति सामन्। जो अपना गान किये जाने पर गायक के दुःखों का नाश करे, वह सामवेद है। हयति (कान्तौ) गच्छतीति क्लाम्यति वा हयः। जो तेजस्विता, प्रसन्नता के प्रति गमन कराये वह हय है। उसका क्या लक्षण है ? अथ साम्नः किं लक्षणम् ? शबरस्वामी सामलक्षणाधिकार में उपदेश करते हैं – सामान्यधीमहि, सामान्यध्यापयामः, सामानि वर्तन्त इति। अभियुक्तोपदेशश्च न प्रमाणम्। यथाम्लं दधि, मधुरो गुड इति। गीतिविशिष्टे तावन्मन्त्रे गीतिशब्दः। गीतिसम्बन्धान्मन्त्रे सम्प्रत्यय इत्यवगन्तव्यम्। जिसका अर्थ सर्वथा स्पष्ट हो कि उसे प्रमाणित करने की आवश्यकता ही नहीं है, जैसे दही का खट्टापन या गुड की मिठास, बिल्कुल प्रत्यक्ष है, उसे अलग से प्रयत्नपूर्वक सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं, सामान्य बुद्धि से जो गम्य हो और उसमें गीतिकाशैली का सम्बन्ध भी हो जाये तो यह सामवेद का लक्षण हैं, ऐसा समझना चाहिए।

मर्कति गच्छतीति मर्कटः। जो सर्वत्र विचरण करता हो, वह मर्कट है। अथर्ववेद मर्कटमुखी है। उसमें आभिचारिक कृत्यों के उपद्रव को शमित करने की दक्षता है। किस उद्देश्य से ? लोक के कल्याण हेतु। लोकमङ्गलाय अर्ब्ब्यते प्रस्तूयते यदथर्वन्। परमेश्वरस्य वेदोऽथर्ववेदः। परमेश्वर का वेद अथर्ववेद है क्योंकि इसमें सब कुछ है। इसमें शेष तीनों के देवनरपितृप्राधान्य क्रिया, स्तुतिगीतोभयविलक्षणलक्षणपरक मन्त्र और प्रवृत्तिनिवृत्तिपरक संहिता, सब है। चरणव्यूहकार ने इसे ब्रह्मवेद कहा है। ब्रह्म को निष्क्रिय कहते हैं – चैतन्याधार निष्क्रिय (बृहद्विष्णुस्मृति)। नमस्ते निष्क्रिय निष्प्रपञ्च। (वराह पुराण)

किसके समान निष्क्रिय होना चाहिए ? निष्क्रिय का अर्थ क्रियाशीलता से हीन नहीं, अपितु क्रियासक्ति से रहित, मर्कट के समान। करता सब है, निरन्तर क्रियाशील है किन्तु क्रिया निरुद्देश्या है। रसगङ्गाधरकार कहते हैं – मर्कट इव निष्क्रियो नितराम्।

ध्वनि दृश्य या अदृश्य नहीं होती। दर्शन रूप तन्मात्रा का विषय है। ध्वनि शब्द तन्मात्रा का विषय है। शब्द आकाश का गुण है, रूप तेजस् का गुण है। आकाश में रूप तन्मात्रा होती ही नहीं अतः ध्वनि अदृश्य नहीं होती, वह अश्रुत होती है। अश्रव्य हो सकती है किन्तु शब्दहीन नहीं। अश्रुत से अर्थ है कि हमारी श्रवण क्षमता में वो न आ सकी। किसी विशिष्ट श्रवण क्षमता वाला भले सुन ले। वेद शब्दब्रह्म हैं। रूपकूटस्थ नहीं, ध्वनिकूटस्थ हैं, श्रुति हैं। अतएव अलग अलग वैदिक, स्मार्त, पौराणिक मतों में वेदों के अलग अलग दृग्गोचर स्वरूप वर्णित हैं, जिसने जैसा देखा, उसने वैसा लिखा। जाकी रही भावना जैसी … आपने जो प्रश्न में श्लोक लिखे हैं, वे भगवान् विश्वकर्मा के द्वारा कहे गये शिल्पशास्त्र के अंश हैं, जिनका सन्दर्भ चतुर्वर्गचिन्तामणि के व्रतखण्ड में एवं शिल्परत्नाकर के एकादशरत्न में मिलता है।

निग्रहाचार्य श्रीभागवतानंद गुरु
Nigrahacharya Shri Bhagavatananda Guru