Home प्रश्न समाधान मोक्ष क्या है एवं इसे कौन प्राप्त कर सकता है ?

मोक्ष क्या है एवं इसे कौन प्राप्त कर सकता है ?

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मोक्षप्राप्ति के लिए प्रयत्नशील लोगों को चाहिए कि मुक्त महापुरुषों के उपदेशों का नित्य मनन और आचरण करें। उनके चरित्र की नकल न करें। नकल करने से बड़ी समस्या में फंसने की बात हो जाती है। सन्तों का प्रारब्ध, उनकी दृष्टि, उनका भाव और उस भाव का संकेत सामान्य जनों की क्षमता से परे होता है, अतएव मुक्त जनों के उपदेश का अनुसरण करना चाहिए, उनके चरित्र की प्रतियोगिता की भावना से नकल नहीं करनी चाहिए।

लोग कहते हैं कि आद्यशंकराचार्य ने चांडाल को प्रणाम किया, चांडाल के स्पर्श को भी अनुचित नहीं माना, इसीलिए हमें भी स्पर्शादि के संदर्भ में यह करना चाहिए। सत्य है कि आद्यशंकराचार्य ने ऐसा किया, किन्तु वे ब्रह्मज्ञानी थे। हालांकि वह मायामय चांडाल था, किन्तु न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते, इसीलिए शंकराचार्य जी परम पवित्र थे। उनकी पवित्रता का स्तर इतना अधिक था कि चांडाल के सम्पर्क से जन्य दोष भी उनके पास जाकर शमित हो जाता। ब्रह्मज्ञानी शाश्वत रूप से पवित्र होता है। जैसे पूर्व में भगवान् ऋषभदेव, महात्मा रैक्व, ऋषि सम्वर्त आदि ने अपना वेष पागलों सा एवं घृणित बना रखा था फिर भी ब्रह्मज्ञान की पवित्रता के कारण वे पवित्र रहे।

आत्मा शाश्वत रूप से निर्मल है, इसीलिए ब्रह्मज्ञानी को दोष नहीं लगता। किन्तु जिन्हें आत्मबोध नहीं हुआ है, उसे दोष लगता है। जैसे तैरने की कला जानने वाले को जल नहीं मारता, किन्तु अनभिज्ञ जन डूब जाते हैं, वैसे ही परकाया प्रवेश में दक्ष योगी को देहजन्य कार्मिक एवं आणविक मल व्याप्त नहीं होते, किन्तु शेष को होते हैं। यहां तक कि शास्त्रोक्त वर्णाश्रम के अनुसार स्पर्शादि का सूक्ष्म विचार करने का निर्देश स्वयं शंकराचार्य जी ने ही सनातन परम्परा के अनुसार दिया है।

जैसे कोई व्यक्ति घर के बाहर भीतर वाले मार्ग से अवगत है, तो आग लगने पर उसे समस्या नहीं होगी, वह बाहर निकल जायेगा। किन्तु जो व्यक्ति उससे अनभिज्ञ है, अंदर कैद है, वह मर जायेगा। वैसे ही ब्रह्मज्ञान से युक्त, देहाभिमान से रहित मुक्त जीव को कोई समस्या नहीं, किन्तु आपको है, हमें है। साइकिल भी वाहन है, हवाई जहाज भी वाहन है। साइकिल से कूदने पर नहीं मरेंगे, हवाई जहाज से कूदने पर मरेंगे।

ब्रह्मज्ञानी के लिए भी कहा है कि असामान्य गतिविधि न करे, बाकी लोगों के ही समान सामान्य क्रिया करते हुए, शास्त्रीय विधा से चले और अन्य को भी इसी के प्रति प्रेरित करे।

सक्ता: कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसंगिनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्त: समाचरन्॥
(श्रीमद्भगवद्गीता)

कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं, आसक्ति रहित तत्त्वज्ञ महापुरुष भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे। सावधान तत्त्वज्ञ महापुरुष कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानी मनुष्यों की बुद्धि में भ्रम उत्पन्न न करे, प्रत्युत स्वयं समस्त कर्मों को अच्छी तरह से करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाये।

जैसे सूर्य के पास स्वयं अंधकार नष्ट हो जाता है, वैसे ही शंकराचार्य जी के दिव्य तेज के समक्ष चाण्डाल आदि से संसर्ग से जन्य दोष भी स्वतः शमित हो गया था, किन्तु लोकव्यवहार और ब्रह्मदृष्टि, दोनों के आधार पर आचार्य ने क्रमशः सन्तुलित व्यवहार किया। महापुरुषों के उपदेश का अनुसरण करना चाहिए, उनके चरित्र की नकल करते हुए हम भी हलाहल पीने लगें तो सामर्थ्य के अभाव में अपना विनाश ही करेंगे।

श्रीमन्महामहिम विद्यामार्तण्ड श्रीभागवतानंद गुरु
His Holiness Shri Bhagavatananda Guru