Home इतिहास पुराण क्या है ज्ञानवापी और काशी विश्वनाथ का रहस्य ?

क्या है ज्ञानवापी और काशी विश्वनाथ का रहस्य ?

1404

भगवान् नारायण के ज्ञानावतार वेदव्यासजी के काल में भी ज्ञानवापी यथावत् थी। उसके समक्ष भगवान् की प्रसन्नता के लिये वेदव्यास जी ने भजन, कीर्तन, नृत्य आदि भी किया है। वेदव्यासजी ने स्वयं उसका वर्णन स्कन्दपुराण में किया है –

व्यासो विश्वेशभवनं समायातः सुहृष्टवत्।
ज्ञानवापीपुरोभागे महाभागवतैः सह॥
विराजमानसत्कण्ठस्तुलसीवरदामभिः।
स्वयं तालधरो जातः स्वयं जातः सुनर्तकः॥
वेणुवादनतत्त्वज्ञः स्वयं श्रुतिधरोऽभवत्।
नृत्यं परिसमाप्येत्थं व्यासः सत्यवतीसुतः॥
(स्कन्दपुराण, काशीखण्ड, अध्याय – ९५)

ज्ञानवापी शब्द और उसका वर्णन सनातन धर्म के ग्रन्थों में ही मिलता है। यह सामान्य बुद्धि का व्यक्ति भी देख कर समझ सकता है कि मन्दिर का विध्वंस करके ऊपर से मस्ज़िद का आवरण चढ़ा दिया गया है। सनातन धर्म से इतर मतों की किताबों में ज्ञानवापी शब्द या उसका वर्णन है ही नहीं। कितनी हास्यास्पद बात है कि लोग दावा करते हैं कि मूर्तिभञ्जक विचारधारा के आक्रान्ताओं ने पहले सनातनी वास्तुशैली में निर्माण प्रारम्भ किया और उसके बाद गुम्बद लगा कर उसका नाम संस्कृत में ज्ञानवापी रख दिया, जिस शब्द का कोई सम्बन्ध उनके मज़हब से है ही नहीं। ज्ञानं महेश्वरादिच्छेत् … ज्ञानसिंहासन की नगरी काशी में भगवान् विश्वनाथ के ज्ञानमण्डप के पास विश्व को ज्ञान को प्रदान करने के लिये ज्ञानवापी की उपयोगिता शास्त्रज्ञों व इतिहासकारों से छिपी हुई नहीं है। फिर भी कोई भय, लोभ, हठ या अज्ञान से सत्य को स्वीकार नहीं करना चाहता है तो इसमें सत्य का कोई दोष नहीं है – नोलूकः सूर्यमीक्षते

हंसवंशावतंस श्रीमन्महामहिम विद्यामार्तण्ड निग्रहाचार्य श्रीभागवतानंद गुरु
His Holiness Shri Bhagavatananda Guru